यदि वसुंधरा होतीं तो....

राजस्थान में लोकसभा के चुनावी नतीजों ने पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को एकबार फिर चर्चा में ला दिया है। विश्लेषकों और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि वसुंधरा के नेतृत्व में भाजपा ने लगातार दो बार 25-25 सीटें जीती थीं। यदि इस बार भी चुनावी कमान उनके हाथ में होती तो परिणाम और होते।

यदि वसुंधरा होतीं तो....

राजस्थान में लोकसभा के चुनावी नतीजों ने पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को एकबार फिर चर्चा में ला दिया है। विश्लेषकों और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि वसुंधरा के नेतृत्व में भाजपा ने 2014 और 2019 में लगातार दो बार 25-25 सीटें जीती थीं। यदि इस बार भी चुनावी कमान उनके हाथ में होती तो परिणाम और होते।

बता दें कि प्रदेश में भाजपा को इसबार करारा झटका लगा है। उसे केवल 14 सीटों पर जीत हासिल हुई है। बाकी 11 संसदीय सीटें उसके हाथ से छिटक गईं। इनमें 8 सीटों पर कांग्रेस तथा 3 सीटों पर इंडिया गठबंधन के सहयोगी दल जीते हैं।

जानकारों का मानना है कि लोकसभा चुनावों में यदि वसुंधरा राजे को पार्टी आलाकमान ने किनारे नहीं किया होता तो परिणाम बेहतर होते। मध्यप्रदेश की तरह राजस्थान में भी सभी 25 सीटें लेकर जीत की हैट्रिक लग सकती थी। क्योंकि वसुंधरा राजे का करौली-धौलपुर, भरतपुर और दौसा सीट पर अपना प्रभाव है। बांसवाड़ा-डूंगरपुर में भी उनका असर बरकरार है। इसके अलावा शेखावटी में वसुंधरा राजे वोटों की गणित बदल सकती थीं।

वसुंधरा राजे का आभामंडल अभी भी बना हुआ है, इसका नजारा झालावाड़ में दिखाई दिया है। उन्होंने अपने गृह क्षेत्र में बेटे दुष्यंत सिंह को लगातार पांचवीं बार संसदीय चुनाव जितावाकर साफ संकेत दे दिया कि उनके गढ में किसी की सेंधमारी संभव नहीं है। उनकी अपनी लोकप्रियता है, जो पूरे प्रदेश की सियासी फिजा बदलने में आज भी सक्षम है।

गौरतलब है कि बीते विधानसभा चुनाव में भाजपा द्वारा किनारे लगाए जाने के बाद से वसुंधरा ने खुद को झालावाड़ में ही सीमित कर लिया। वह पूरे चुनाव में अपना क्षेत्र छोड़कर बहुत कम बाहर निकलीं। अब ये चिंतन भाजपा नेतृत्व को करना है कि वह वसुंधरा राजे को किनारे ही रखना चाहता है या मुख्यधारा में लाकर आने वाले समय में पार्टी में अहम बदलाव करना चाहता है।